फ़ज्र के लिए कैसे उठें: सुन्नत और नींद विज्ञान से एक योजना
कब सोएँ, गर्मियों की छोटी रातों में क्या करें, और अलार्म बजते ही सुन्नत के तीन क़दम। हर हदीस अपने स्रोत के साथ।
फ़ज्र इतनी मुश्किल क्यों है
फ़ज्र आपसे उस समय उठने को कहती है जिसे आपका शरीर शायद अब भी रात मानता है। अपनी जैविक रात में जागने से जागने के बाद की सुस्ती भारी हो जाती है, और कम नींद से भी।[6] (पहले कुछ मिनट इतने भारी क्यों लगते हैं, यह एक अलग लेख का विषय है: स्लीप इनर्शिया, आसान शब्दों में।)
गर्मियों में आप भूमध्य रेखा से जितना दूर रहते हैं, फ़ज्र उतनी जल्दी और इशा उतनी देर से आती है, यानी रात दोनों तरफ़ से सिकुड़ जाती है। इसीलिए ज़्यादा तेज़ अलार्म से समस्या शायद ही हल होती है। हल यह है कि आप पूरी नींद लेकर अलार्म तक पहुँचें।
पिछली रात से शुरुआत करें
आइशा (अल्लाह उनसे राज़ी हो) ने नबी ﷺ की रातों का वर्णन किया:
عن عائشة رضي الله عنها أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يَنَام أول اللَّيل، ويقوم آخره فَيُصلِّي.
आइशा- रज़ियल्लाहु अन्हा- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) रात के प्रथम भाग में सोते और अंतिम भाग में उठकर नमाज़ पढ़ते थे। — इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।[1]
आज की शाम के लिए इसका मतलब है: जल्दी सोएँ, और उससे पहले के घंटे शांत रखें। फ़ोन भी जल्दी रख दें। एक लैब अध्ययन में, जिन लोगों ने सोने से पहले रोशनी देने वाले टैबलेट पर पढ़ा, उन्हें छपी किताब पढ़ने की तुलना में सोने में ज़्यादा समय लगा, उनमें मेलाटोनिन (वह हार्मोन जो शरीर को नींद के लिए तैयार करता है) कम बना, और अगली सुबह वे कम चुस्त थे।[7]
नींद विज्ञान इसमें एक संख्या जोड़ता है: वयस्कों को नियमित रूप से 7 घंटे या उससे ज़्यादा सोना चाहिए।[2] तो अपने अलार्म से पीछे की ओर गिनें:
| अगर अलार्म बजता है | इस समय तक सो चुके हों |
|---|---|
| सुबह 3:30 | रात 8:30 |
| सुबह 4:00 | रात 9:00 |
| सुबह 4:30 | रात 9:30 |
| सुबह 5:00 | रात 10:00 |
| सुबह 5:30 | रात 10:30 |
| सुबह 6:00 | रात 11:00 |
ये सो चुकने के समय हैं, बिस्तर पर लेटने के नहीं, इसलिए नींद आने में आम तौर पर जितना समय लगता है, उसे भी जोड़ें। यह ब्लॉग नमाज़ के समय प्रकाशित नहीं करता: फ़ज्र का समय अपनी मस्जिद से या किसी भरोसेमंद कैलकुलेटर से लें।
जब रात बहुत छोटी हो: नींद बाँट लें
गर्मियों की कुछ रातों में इशा और फ़ज्र के बीच 7 घंटे होते ही नहीं। तब एक हिस्से के बजाय पूरे दिन की कुल नींद का लक्ष्य रखें:
- इशा के बाद मुख्य हिस्सा, और
- दिन इजाज़त दे तो फ़ज्र के बाद दूसरी नींद, या दोपहर की शुरुआत में एक छोटी झपकी।
हिस्सों में बँटी रात सुन्नत के लिए अनजानी नहीं है। नबी ﷺ ने दाऊद की नमाज़ को अल्लाह की सबसे प्रिय नमाज़ बताया, और वह रात को नींद, नमाज़ और फिर नींद में बाँटती है:
عن عبد الله بن عمرو بن العاص رضي الله عنهما قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم : «إن أَحَبَّ الصيام إلى الله صِيَامُ داود، وأحب الصلاة إلى الله صلاة داود، كان يَنَامُ نِصْفَ اللَّيْلِ، وَيَقُومُ ثُلُثَهُ، وَيَنَامُ سُدُسَهُ، وكان يصوم يومًا ويُفطِرُ يومًا».
अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस- रज़ियल्लाहु अन्हुमा-कहते हैं कि अल्लल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः अल्लाह के निकट सबसे प्रिय रोज़ा दाऊद- अलैहिस्सलाम- का रोज़ा और सबसे प्रिय नमाज़ दाऊद- अलैहिस्सलाम- की नमाज़ है। वह आधी रात सोते, फिर एक तिहाई रात नमाज़ पढ़ते और शेष छठा भाग सोते थे। इसी तरह एक दिन रोज़ा रखते और एक दिन बिना रोज़े के रहते थे। — इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।[8]
शोध भी इस बात का समर्थन करता है। 15 से 19 साल के किशोरों पर एक लैब अध्ययन में, रात के हिस्से और दोपहर की झपकी में बँटी 8 घंटे की नींद ध्यान, याददाश्त और मूड के लिए उतनी ही अच्छी रही जितनी एक बार में 8 घंटे।[3] 11 अध्ययनों की एक समीक्षा में पाया गया कि दिन की झपकी से प्रदर्शन, ख़ासकर चुस्ती, बेहतर हुई, और दोपहर की शुरुआत की झपकी सबसे अच्छी रही।[9]
अगर झपकी के तुरंत बाद आपको तेज़ रहना है, तो उसे 30 मिनट से कम रखें। छोटी झपकी आम तौर पर गहरी नींद शुरू होने से पहले ख़त्म हो जाती है, इसलिए उठने पर सुस्ती कम होती है।[6]
जब अलार्म बजे
नबी ﷺ ने बताया कि उन पहले मिनटों में क्या होता है:
عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ قَالَ: «يَعْقِدُ الشَّيْطَانُ عَلَى قَافِيَةِ رَأْسِ أَحَدِكُمْ إِذَا هُوَ نَامَ ثَلاَثَ عُقَدٍ يَضْرِبُ كُلَّ عُقْدَةٍ عَلَيْكَ لَيْلٌ طَوِيلٌ، فَارْقُدْ، فَإِنِ اسْتَيْقَظَ فَذَكَرَ اللَّهَ، انْحَلَّتْ عُقْدَةٌ، فَإِنْ تَوَضَّأَ انْحَلَّتْ عُقْدَةٌ، فَإِنْ صَلَّى انْحَلَّتْ عُقْدَةٌ، فَأَصْبَحَ نَشِيطًا طَيِّبَ النَّفْسِ، وَإِلَّا أَصْبَحَ خَبِيثَ النَّفْسِ كَسْلاَنَ».
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "शैतान तुममें से हर व्यक्ति के सर के पीछ रात में सोते समय तीन गाँठ लगा देता है और हर गाँठ पर यह कहकर फूँक मारता है कि सो जा, अभी रात बहुत बाक़ी है। फिर अगर आदमी जागकर अल्लाह को याद करने लगे, तो एक गाँठ खुल जाती है। फिर अगर वज़ू कर ले तो एक और गाँठ खुल जाती है। फिर अगर नमाज़ पढ़ ले तो एक और गाँठ भी खुल जाती है। इस तरह सुबह के समय आदमी चुस्त और प्रफुल्लित रहता है। वरना, उदास और सुस्त रहता है।" — इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है[4]
यह एक क्रम है जो आँख खुलते ही शुरू होता है:
- अल्लाह को याद करें।
- वज़ू करें। यह आपको बिस्तर से उठाकर पैरों पर खड़ा कर देता है।
- नमाज़ पढ़ें।
यह हदीस ग़ैब की बात करती है, और उस पर ईमान के लिए किसी लैब की ज़रूरत नहीं। व्यावहारिक पहलू से यह नींद विज्ञान की बात से मेल खाती है: जागने के बाद के पहले मिनट सबसे भारी होते हैं,[6] और एक अध्ययन में जागते ही कुछ मिनट की साँस और मांसपेशियों की कसरत ने इन मिनटों को आसान बना दिया।[10] चुपचाप पड़े रहना और अलार्म से मोल-भाव करना ही वह विकल्प है जिसकी सलाह कोई नहीं देता।
हर दिन एक जैसा रखें
नियमित समय मदद करता है। ब्रिटेन के 60,977 वयस्कों पर एक अध्ययन में, सबसे नियमित नींद वाले लोगों में अगले वर्षों में मौत का ख़तरा सबसे अनियमित नींद वालों से 20 से 48% कम था।[5] यह एक संबंध है, इसका सबूत नहीं कि नियमितता ही कारण है, लेकिन यह उसी दिशा में इशारा करता है जिसमें ऊपर की हर बात: सोने का समय और फ़ज्र का अलार्म लगभग एक जैसा रखें, छुट्टी के दिन भी।
सुन्नत भी इसी चीज़ को महत्व देती है। जब आइशा ने नबी ﷺ को एक ऐसी औरत के बारे में बताया जो अपनी बहुत सारी नमाज़ों के लिए जानी जाती थी, तो आपने फ़रमाया:
عن عائشة رضي الله عنها : أن النبي صلى الله عليه وسلم دخل عليها وعندها امرأة، قال: «من هذه؟» قالت: هذه فلانة تذكر من صلاتها. قال: «مَهْ، عليكم بما تطيقون، فوالله لا يَمَلُّ الله حتى تَمَلُّوا» وكان أحب الدين إليه ما داوم صاحبه عليه.
आइशा -रज़ियल्लाहु अन्हा- से रिवायत है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- एक बार उनके पास तशरीफ़ लाए। वहाँ एक औरत बैठी थी। आपने पूछाः "यह कौन है?" आइशा -रज़ियल्लाहु अन्हा- ने कहा कि यह अमुक औरत है, जो अपनी नमाज़ का हाल बयान कर रही है। आपने फ़रमाया : "ठहरो! तुम उतना ही अमल करो, जितने की क्षमता रखते हो। अल्लाह की सौगंध, अल्लाह नहीं उकताएगा, यहाँ तक कि तुम ही उकता जाओगे।" तथा आपकी नज़र में वही अमल सबसे प्रिय था, जिसे करने वाला हमेशा करता रहे। — इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।[11]
किसी नई दिनचर्या को अपने आप चलने में भी समय लगता है: आदतें बनने में असल में कितना समय लगता है।


